Chandra Shekhar Azad: भारत माता के महान सपूत चंद्रशेखर आजाद जिन्होंने अपना प्राण न्यौछावर कर देश को आज़ादी दिलाई, जानें उनके बारे में खास बातें

Chandrashekhar Azad, the great son of Mother India, who sacrificed his life and gave freedom to the country, know special things about him
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Chandrashekhar Azad, the great son of Mother India, who sacrificed his life and gave freedom to the country, know special things about him
चंद्रशेखर आजाद – फोटो : @peoplematters

भारत माता के महान सपूत चंद्रशेखर आजाद जिन्होंने अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देश को आजादी दिलाने में सर्वोच्च भूमिका निभाई। बता दें की काशी से उनका अटूट नाता रहा है। किशोरावस्था में ही चंद्रशेखर काशी चले गए थे. वहां उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ली। चंद्रशेखर तिवारी को उनकी बहादुरी और अदम्य साहस के कारण ‘आजाद’ नाम ज्ञानवापी में हुई सभा में मिला।

अपने अदम्य साहस के कारण ही 15 वर्ष की उम्र में वर्ष 1921 काशी में छात्रों का एक समूह विदेशी कपड़ों की दुकान के बाहर धरना दे रहा था। इसी दौरान पुलिस आई और सभी को लाठियों से पीटने लगी। किशोर चंद्रशेखर तिवारी ने गुस्से में आकर दरोगा को पत्थर मार दिया। पुलिस ने चंद्रशेखर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश की। मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा तो उन्होंने आजाद बताया। वहीं मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर का नाम जेल बताया। मजिस्ट्रेट ने किशोर चंद्रशेखर का तेवर देख कर 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी। शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में बेंत की टिकठी से बांध कर आजाद को जेलर ने कोड़ा मारना शुरू किया तो हर कोड़े पर वह भारत माता की जय कहते थे। किशोर चंद्रशेखर जेल से बाहर आए तो उनकी बहादुरी और साहस का किस्सा काशीवासियों की जुबान पर था। ज्ञानवापी में हुई एक सभा में चंद्रशेखर तिवारी का नामकरण कर चंद्रशेखर आजाद किया गया।

वाराणसी के लहुराबीर इलाके में उनके नाम पर आजाद पार्क है तो सेंट्रल जेल में जहां उन्हें कोड़े मारे गए थे, वहां उनकी आदमकद प्रतिमा के साथ भव्य स्मारक है।

चंद्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के मौजूदा अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव (अब चंद्रशेखर आजाद नगर) में पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था। आजाद की मां जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसी वजह से किशोरावस्था में पढ़ाई के लिए उन्हें काशी भेजा दिया गया था।

कैसे हुआ क्रांतिकारियों से संपर्क

सेंट्रल जेल में जब न्यायधीश ने आजाद को कोड़े मारने की सजा सुनाई थी उसी घटना के बाद ही वह काशी में क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए थे। काशी में मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आजाद आए और निशानेबाजी में निपुण होने के कारण सशस्त्र क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए। क्रांतिकारियों का यह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था।

जब महत्मा गाँधी ने चौरीचौरा कांड 1922 में असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो कांग्रेस से आजाद का मोहभंग हो गया था। काकोरी कांड, अंग्रेज अफसर जेपी सांडर्स की हत्या और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले आजाद प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी मृत्यु के बाद देश में क्रांति की लहर और तेज हो गई. 15 अगस्त 1947 को देश को आज़ादी मिली और चंद्रशेखर आजाद देश के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हमेशा के लिए अमर हो गए।

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